कश्मकश

बड़ी कश्मकश में है जिंदगी ,सांस लेना भी मुश्किल है और थामना भी। जब भी असफ़ल होता हुँ कुछ न कुछ छूट जाता है , अपने तो कब के बिखर गये बस उम्मीद है की कभी टूटती नहीं। मैं अस्थिर हुँ , क्युंकि मैं परवाह करता हुँ , पर शायद पानी की तरह अस्थिरता में ही झीलों और पोखरों की तरह सुंदरता है। पानी की मंज़िल स्थिरता नहीं है वह लगातार बाधाओं को दूर करते बहती रहती है , कभी -कभी वह खुद ही बहते -बहते बाधा बना लेती है ,पर अपनी प्रकृती नहीं छोड़ती। बिना रुके लगातार करोड़ों की प्यास बुझाती जाती है ,और स्थिरता कुछ लोगों की, स्थिरता आवश्यक है ,पर बिचारों में न की प्रकृति या मंजिल में.………………

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