खुद से मुलाकात
कशुर ना उस फैसले का था , ना इस फैसले का है .
शुरुर तो इन पैरों का है , जो कभी थमना ही नहीं जानते .
एक वक़्त था जो गुजर गया , जब गलियों में कंचे खेला करते थे .
एक वक़्त है जो वजूद की तलाश में गुजर जायेगा .
आज भी देखता हु उस सख्श को आइने में
जो संभालता हुआ गिरता हुआ नज़र आता है .
किसी ने कहा था ,कोयला भी तप कर हीरा बन जाता है ,
आज भी जल - जल कर जी रहा हूँ ,हीरे की तलाश में .
कब कोई ख्वाब पूरा हो तो , एक गहरी साँस लेता .
पर कही वो मेरी आखरी सांसे ही ना हो .
पर जिंदगी यही ख़तम नहीं होती ,
और उम्मीद कभी कम नहीं होती .
कहते है जिंदगी बहुत छोटी है ,
और दुनिया बड़ी लम्बी .
कभी किसी मोड़ पर खुद से मुलाकात तो होगी ...
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